“आटो वाले कान्हा” का महादेव को अनूठा प्रणाम – महाशिवरात्रि पर बुजुर्गों, दिव्यांगों और माताओं के लिए निशुल्क सेवा
गरियाबंद। कहते हैं, सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं, और दिल बड़ा हो तो इंसान किसी के भी जीवन में खुशियां भर सकता है। गरियाबंद के “आटो वाले कान्हा” देवदास ने महाशिवरात्रि पर यही मिसाल पेश की। हर साल की तरह इस बार भी उन्होंने अपने ऑटो को भोलेनाथ की सेवा में समर्पित कर दिया, बिना किसी स्वार्थ के, बिना किसी लालच के।
भोलेनाथ की सेवा में “आटो वाले कान्हा” की अनूठी पहल
महाशिवरात्रि पर गरियाबंद के भूतेश्वरनाथ धाम में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। दूर-दूर से आए बुजुर्ग, दिव्यांग और नवजात शिशु की माताएं जब लंबी दूरी पैदल तय करने में असमर्थ दिखे, तो “आटो वाले कान्हा” देवदास ने खुद पहल कर सभी के लिए निशुल्क सेवा शुरू कर दी।
हर साल महाशिवरात्रि के दिन वह अपनी रोज़ी-रोटी चलाने वाले ऑटो को केवल सेवा के लिए चला देते हैं। इस दिन उनके लिए कोई किराया नहीं, कोई पैसा नहीं, सिर्फ श्रद्धालुओं की दुआएं कमाने का सौभाग्य मिलता है।
“शिव भक्ति में कोई पीछे न रह जाए, यही मेरी पूजा”
कान्हा कहते हैं, “मैंने देखा कि बुजुर्ग, दिव्यांग, महिलाएं और छोटे बच्चों के साथ माताएं इस आधा किलोमीटर की दूरी को तय करने में बहुत परेशानी महसूस कर रही थीं। ऐसे में मैंने समिति से बात की और निर्णय लिया कि पूरे दिन मैं निशुल्क सेवा दूंगा, ताकि कोई भी श्रद्धालु भोलेनाथ के दर्शन से वंचित न रह जाए।”
सुबह से शाम तक बस सेवा और सेवा
सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक कान्हा बिना रुके श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुंचाते रहे। ना थकान की परवाह, ना किराए की चिंता – बस एक ही लक्ष्य, शिव भक्ति में सबकी मदद करना।
“आज पैसा नहीं, सिर्फ दुआएं कमानी हैं”
कान्हा ने कहा, “आज के दिन मैं सिर्फ़ दुआ कमाना चाहता हूँ। एक दिन अपने भोलेनाथ की सच्ची सेवा करता हूँ और सालों से यही करता आ रहा हूँ। जब किसी बुजुर्ग का आशीर्वाद मिलता है, जब कोई दिव्यांग मेरी वजह से भोलेनाथ के दर्शन कर पाता है, तो जो संतोष मुझे मिलता है, वह लाखों रुपयों से भी बड़ा है।”
“हर साल यही सेवा करूंगा”
आटो वाले कान्हा की इस पहल की हर तरफ सराहना हो रही है। लोग उनके इस सेवाभाव को देखकर भावुक हो रहे हैं और उन्हें सच्चा शिव भक्त कह रहे हैं। महाशिवरात्रि पर उनकी यह अनोखी श्रद्धा अब गरियाबंद की पहचान बन चुकी है।
कहते हैं, “शिव भक्ति केवल मंदिर जाने तक सीमित नहीं, यह सेवा में भी दिखाई देती है।” और “आटो वाले कान्हा” ने यह साबित कर दिया कि सच्ची श्रद्धा का अर्थ केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की मदद करना भी है।