कारगिल : द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक ऐसा युद्ध जब कारगिल की चोटियों पर फहरा तिरंगा  साल 1999 में हुई इस लड़ाई में क़रीब 610 भारतीय सैनिकों की मौत हुई.

26 जुलाई 1999 का वो ऐतिहासिक दिन जो आज 20 साल बाद भी लोगों में देश भक्ति की अलख जगाता है आज भी हर देशवासियों में उस दिन को याद करके रोमांच भर देता है कि हमारी जाबांजी सेना के जवानों ने अपनी शौर्यता का परिचय दिखाते हुए पाकिस्तान की सेना को धूल चटाई थी।

देश आज कारगिल पर विजय की 20वीं वर्षगांठ मना रहा है। 1999 में आज ही के दिन भारत के वीर सपूतों ने कारगिल की चोटियों से पाकिस्तानी फौज को खदेड़कर तिरंगा फहराया था।

साल 1999 का कारगिल युद्ध भारतीय शौर्य और गौरव के इतिहास की एक अमिट गाथा तो है ही, इस जंग ने दुनिया भर में हिन्दुस्तान की छवि एक जिम्मेदार ताकत के रूप में स्थापित की। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की इस संकट से निपटने की परिपक्व कूटनीति ने पाकिस्तानी हिमाकत को उसकी करारी शिकस्त में बदल दिया। दुश्मन को न सिर्फ सरहद पर घुटने टेकने पड़े, बल्कि इस करतूत के लिए पूरे संसार में उसे शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

पाकिस्तानी सेना और कश्मीरी उग्रवादियों ने भारत और पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा को पार करके भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की थी। पाकिस्तान ने दावा किया था कि लड़ने वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन जब युद्ध में दस्तावेज़ बरामद हुए और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से ये आखिरकार ये साबित हो ही गया कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी।

यह युद्ध 18000 फुट ऊँचाई वाले इलाके पर हुआ और दोनों देशों की सेनाओं को इसमें लड़ने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।परमाणु बम बनाने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ यह पहला सशस्त्र संघर्ष था।

वैसे सब यही जानते हैं कि कारगिल युद्ध हुआ लेकिन इस युद्ध के घटनाक्रम की शुरुआत कैसे हुई –

3 मई 1999 को एक चरवाहे ने भारतीय सेना को कारगिल में पाकिस्तान सेना के घुसपैठ कर कब्जा जमा लेने की सूचनी दी। 5 मई को भारतीय सेना की पेट्रोलिंग टीम जानकारी लेने कारगिल पहुँची तो पाकिस्तानी सेना ने उन्हें पकड़ लिया और उनमें से 5 की हत्या कर दी।फिर 9 मई को पाकिस्तानियों की गोलाबारी से भारतीय सेना का कारगिल में मौजूद गोला बारूद का स्टोर नष्ट हो गया।

भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के खिलाफ मिग-27 और मिग-29 का भी इस्तेमाल किया। इसके बाद जहाँ भी पाकिस्तान ने कब्जा किया था वहाँ बम गिराए गए। इसके अलावा मिग-29 की सहायता से पाकिस्तान के कई ठिकानों पर आर-77 मिसाइलों से हमला किया गया।

इस युद्ध में बड़ी संख्या में रॉकेट और बमों का इस्तेमाल किया गया। इस दौरान करीब दो लाख पचास हजार गोले दागे गए। वहीं 5,000 बम फायर करने के लिए 300 से ज्यादा मोर्टार, तोपों और रॉकेटों का इस्तेमाल किया गया। युद्ध के 17 दिनों में हर रोज प्रति मिनट में एक राउंड फायर किया गया। बताया जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यही एक ऐसा युद्ध था जिसमें दुश्मन देश की सेना पर इतनी बड़ी संख्या में बमबारी की गई थी।

10 मई को पहली बार लदाख का प्रवेश द्वार यानी द्रास, काकसार और मुश्कोह सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को देखा गया। और 26 मई को फिर भारतीय वायुसेना को कार्यवाही के लिए आदेश दिया गया। 27 मई कार्यवाही में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के खिलाफ मिग-27 और मिग-29 का भी इस्तेमाल किया और फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता को बंदी बना लिया गया।

पहली नजर में, पाकिस्तानी सेना का सर्दियों में कारगिल की चोटियों पर कब्जा करना एक सोचा-समझा दुस्साहसी कदम दिखाई था। लेकिन भारतीय सेना ने उसे मुक्त करा लिया। वह भारत की कूटनीतिक व सैन्य जीत थी। इसका श्रेय प्रधानमंत्री वाजपेयी की कुशल नीति को जाता है।

 

 

 

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