बच्ची का साहस: पिता की अंतिम क्रिया तक स्वयं को संभाला, दायित्व पूरा करने के बाद ही निकले आंसू

आरंग। नगर में एक ऐसी शवयात्रा निकली जिससे सभी भावविभोर हो गए। दृश्य था, पुत्री द्वारा पिता के शव को कांधा दिए जाने का। पिता की मृत्यु के बाद मृत्यु उपरान्त किए जाने वाले संस्कारों से लेकर अंतिम क्रिया तक इस छोटी सी बच्ची ने जिस तरह से स्वयं को संभाला, उसे देखकर हर किसी की आंखों में आंसू आ गए। अंतिम क्रिया के पश्चात ये बच्ची फूटकर रोई। बच्ची के साहस को देखकर वहां उपस्थित लोग भी चकित रह गए।

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परिवार में किसी की मृत्यु होने पर लोग घर के लोगों को समझाते हैं। लोग कहते हैं कि अभी बहुत सारे दायित्व शेष हैं। यदि तुम ही ऐसा रोने लगोगे तो बाकियों को कौन संभालेंगे…। सांत्वना के लिए उपयोग किए जाने वाले ये आम शब्द हैं। जिन्हें अपने के जाने का दुख होता है, उनके लिए अपने आंसुओं को संभालना बहुत ही कठिन होता है। आरंग में एक ऐसी ही दुखद घटना में 10-11 वर्ष की एक बच्ची ने जो साहस दिखाया, वो अकल्पनीय है। बच्ची के पिता रेखराज सोनकर ने वर्षो तक किडऩी की बीमारी से लड़ते हुए कल प्राण त्याग दिए थे। ये बच्ची श्रुति ही उनकी एकमात्र संतान थी। पिता के जाने के दुख के बीच उसने अपनी मां को संभाला। उसने अपने मन को दृढ़ कर पिता की अर्थी को कांधा दिया। श्मशान घाट में उसने पूरी दृढ़ता के साथ उनकी अंतिम क्रिया संपन्न की। पिता के शव को अग्नि देने से पहले तक श्रुति भावशून्य ही रही। अग्नि देने के बाद पिता के जाने का दुख फूट पड़ा। छोटी सी ये बच्ची वही पर फूट-फूटकर रोने लग गई। परिवार के अन्य लोगों ने उस बच्ची को संभाला।

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आरंग के लोगों ने इस बच्ची के साहस की प्रशंसा की है। रेखराज की अंतिम यात्रा में नगर के सभी समाज के लोग उपस्थित थे। सभी ने बच्ची को धीरज बंधाया। लोगों ने बताया कि कुमारी श्रुति सोनकर स्थानीय सृजन सोनकर विद्या मंदिर की मेघावी छात्रा है। परिवार की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए सोनकर समाज के द्वारा नि:शुल्क शिक्षा प्रदान की जा रही है। समाज के लोगों ने कहा कि बच्ची की पढ़ाई के साथ उसके उन्नत भविष्य के लिए समाज हर संभव कार्य करेगा।

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