BJP बताए गठन के बाद आजादी तक के 22 साल में RSS का स्वतंत्रता संग्राम में क्या योगदान था- मोहन मरकाम

रायपुर। भाजपा मुख्यालय में हर घर अभियान के लिए तिरंगा बेचे जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा कि जो लोग देश बेच रहे थे,

अब तिरंगा बेचने में लग गए. भाजपा का मूल चरित्र धंधे बाजी है. आजादी की लड़ाई के समय इनके पूर्वज अंग्रेजों के चंद चांदी के टुकड़ों के लिए देश की आजादी की लड़ाई बाधा डालते थे.

आज भाजपाई भारत की आन-बान-शान तिरंगे का व्यापार शुरू कर दिए. वास्तव में तिरंगे के प्रति सम्मान है तो लोगों को मुफ्त उपलब्ध करवाए.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा कि तिरंगा कांग्रेस के लिए स्वाभिमान का प्रतीक है. भाजपा के लिये राजनीति करने का जरिया मात्र है.

भाजपा द्वारा आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर हर घर तिरंगा का अभियान स्वतंत्रता आंदोलन में भाजपा के काले इतिहास में पर्दा डालने की कोशिश मात्र है.

कांग्रेस पार्टी के लिए तिरंगा स्वाभिमान का प्रतीक है, इसीलिए झंडे के तले कांग्रेस ने देश की आजादी की लड़ाई लड़ा था और देश को आजाद कराया.

आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर देश भक्ति का जलसा निकालने की नौटंकी करने वालों के पूर्वज स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेजों के पैरोकार की भूमिका में खड़े थे.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा कि भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस के मूलस्वरूप हिन्दू महासभा का गठन 1925 में हुआ, देश आजाद 1947 में हुआ

इन 22 सालों तक भारत के आजादी की लड़ाई में हिन्दू महासभा का क्या योगदान था? भाजपाई बता नहीं सकते. 1947 में जब देश आजाद हुआ तब दीनदयाल उपाध्याय 32 वर्ष के परिपक्व नौजवान थे.

देश की आजादी की लड़ाई में उनका क्या योगदान था? कितनी बार जेल गये? 1942 में कांग्रेस महात्मा गांधी की अगुवाई में भारत छोड़ो आंदोलन चला रही थी

तब भाजपा के पितृ पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी अंग्रेजी हूकूमत को सलाह दे रहे थे कि भारत छोड़ो आंदोलन को क्रूरतापूर्वक दमन किया जाना चाहिए.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा कि देश की आन-बान-शान का प्रतीक रहे तिरंगा को भाजपा ने पितृ पुरुष गोलवलकर ने देश के लिए अपशगुन बताया था.

तिरंगे के प्रति सम्मान का आडंबर कर रही भाजपा के आदर्श गोलवलकर ने अपनी पुस्तक बंच ऑफ थॉट्स में तिरंगा को राष्ट्रीय ध्वज मानने से ही मना कर दिया था.

इस पुस्तक में उन्होंने लोकतंत्र और समाजवाद को गलत बताते हुए संविधान को एक जहरीला बीज बताया था. 30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गांधी की हत्या कर दी गयी तो अखबारों के माध्यम से खबरें आई थीं कि आरएसएस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंदकर खुशी मना रहे थे.

आज़ादी के संग्राम में शामिल लोगों को आरएसएस की इस हरकत से बहुत तकलीफ हुई थी. जवाहरलाल नेहरू जी ने 24 फरवरी 1948 को अपने एक भाषण में इस घटना को लेकर कड़ा विरोध जताया था

और ऐसा करने वालों को देशद्रोही बताया था. आजादी के बाद 50 सालों तक आरएसएस के मुख्यालय नागपुर में तिरंगा नहीं फहराया जाता था।

आजादी के अमृत महोत्सव के नाम पर राष्ट्रभक्ति की नौटंकी करने वाले भाजपाई आजादी की लड़ाई में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को विरोध करते थे.