भूखमरी और कर्ज ने पिताओं का बना दिया, अपनी ही बेटियों का सौदागर

कहा जाता है कि इंसान पेट और पेट के नीचे की आग को बुझाने के लिए हैवान बन जाता है। लेकिन इस दुनिया में यह खुली आंखों से नजर आ रहा है। बद से बदतर हालात के बीच जीवन जी रहे अफगानियों की यह दास्तां इतनी भयानक है कि हैवानियत भी कमजोर पड़ जाए। अफगान पर तालिबान ने ताकती हमले से कब्जा तो कर लिया, लेकिन वहां के लोगों की जिंदगी को नरक बना दिया है।

भूख और कर्ज से बिलबिला रहे अफगानियों को किसी तरह की मदद नहीं मिल रही है। आलम यह है कि जिन पिताओं ने अपनी बेटियों को लेकर ऊंचे ख्वाब देखे थे, उनके बेहतर भविष्य के लिए सपने संजोए थे, वे ही अपनी बेटियों के सौदागर बनने के लिए मजबूर हो गए हैं। अपनी मासूम बेटियों को दो से तीन गुना अधिक उम्र के लोगों को बेचने के अलावा उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं दिख रहा है।

हद तो यह है कि जिन बच्चियों ने तालिबानी गुलामी के बाद जन्म लिया है, उनका तक सौदा करने के लिए पिता मजबूर हैं। तालिबान में ना तो काम है, ना रोजगार है और ना ही कोई व्यापार है। सरकार ही नहीं तो आखिर किससे रहेगी मदद की दरकार। जो कुछ बैंक में था, सबकुछ अब लूट चुका है।

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